तू कही भी रहे - गुलाम अली खां

                 उस्त्ताद गुुुलााम अली खाां
तू कही भी रहे सर पर तेरे इल्जाम तो है
मेरे हाथों की लकीरों में तेरा नाम तो है।
तू कही भी रहे सर

मुझको तू अपना बना या ना बना तेरी खुशी
तू जमाने मे मेरे नाम से बदनाम तो है
तू कही भी रहे सर

मेरे हिस्से में कोई जाम ना आया ना सही
तेरी महफ़िल में मेरे नाम कोई शाम तो है
तू कही भी रहे सर

देखकर लोग मुजे नाम तेरा लेते है
इसमे में खुश हूं मोहब्बत का ये अंजाम तो है
तू कही भी रहे सर

वो सितमगर ही सही देख के उसको शाबिर
शुक्र है इस दिल-ए-बीमार को आराम तो है
तू कही भी रहे सर

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